Friday, August 14, 2009

मेरी फुल्वारी


















































































मैं नहीं समझता कि इस धरा पर कोई ऐसा मनुष्य होगा जिसे फूल और नन्हें-मुन्हे बच्चे अच्छे नहीं लगते होंगे। आप किसी भी मूड में हों यह दोनों ही राह चलते बरबस ही हमें आकर्षित कर लेते हैं। तनिक ध्यान देकर तो देखिये, अपने अमूल्य और कीमती समय से कुछ क्षण प्रकृति कि इस अनमोल देन के मध्य व्यतीत तो कीजिये। स्तब्ध रह जायेंगे, ठगे से रह जायेगे और सोचने को मजबूर हो जायेंगे कि क्या सोच कर विधाता ने हमारे ऊपर इतना बढ़ा उपकार किया है ? यूँ तो सारे विश्व में लाखों तरह कि वनस्पतियाँ ,पेड पौधे और फल -फूल पाये जाते हैं। मेरी ऐसी सोच है कि वनस्पतियों, पेड़- पौधों और फलों आदि से मनुष्य जाति का सीधा सम्बन्ध है क्यूंकि हम इनका प्रयोग करके लाभ उठाते हैं। परन्तु फूल तो प्रकृति कि ऐसी अनमोल देन है जिसे मात्र निहारने से ही मन, तबियत और आत्मा खुश और तृप्त हो जाती है। व्यक्ति सभी तरह के सुख-दुःख भूलकर प्रकृति की इस सर्वोत्तम कलाकृति को निहारता ही रह जाता है ।
आज हमारे आस-पास अनगिनत फूलों की किस्में देखने को मिलती हैं। विदेशी किस्मों की बात न भी की जाए तो भी हमारे भारतवर्ष में ही हजारों प्रकार के फूलों की किस्में पाई जाती हैं। मुझे फूलों के विषय में कोई विशेष जानकारी की बात तो दूर , हमारे आस-पास पाये जाने वाले सभी फूलों के नामों का भी पता नहीं है । परन्तु फूलों के प्रति दीवानगी और तरह-तरह के फूल उगाने का शौक इस कदर है की जहाँ कहीं से भी अगर कोई नया फूल वाला पौधा मिल जाए तो लगता है जैसे लॉटरी ही निकल आई हो। मुझे पता नही की सभी पुष्प-पालकों के साथ ऐसा ही होता होगा , परन्तु मुझे तो अपने उगाये पौधों से इस कदर लगाव हो जाता है की यदि किसी से गलती से भी उस पौधे को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान हो जाए तो मुझ से सहन नहीं होता। अपनी फुलवारी में उगाये गए फूलों वाले पौधे मुझे अपने बच्चों सामान लगते हैं। बीज डालकर सुबहो-शाम अंकुर फूटने से लेकर फूल खिलने की प्रक्रिया की तुलना तनिक अपने नवजात बच्चे से कर के तो देखिये। पैदा होने से लेकर यौवनावस्था तक की अवस्था एक सामान सी लगेगी। मुझे तो दोनों में कोई अंतर दिखाई नहीं देता।
स्वाभाव से धार्मिक हूँ और देशभक्ति का भी जज्बा है, शायद इसी लिए मन्दिर और शहीद-स्थली के अतिरिक्त किसी भी स्थान पर फूलों से की जाने वाली सजावट मुझे तनिक भी नहीं भाति है। यह सारी की सारी प्रकृति और कायनात उसी प्रभु की ही तो देन है। एक वही शक्ति तो जन्म-दाता, पालक और संहारक है। वही देने वाला और वही लेने वाला है। इस लिए देव-स्थल पर फूलों की सजावट से ऐसा लगता है की फूलों की ठीक स्थान पर परिणिति हुई है। भला इससे बेहतर सम्मान और क्या होगा कि भगवान् के साथ-साथ, चाहे अनजाने में ही हम उन अर्पित पुष्पों के आगे भी नत-मस्तक हो कर उन्हें भी नमन करते हैं। इसी तरह शहीद-स्थली पर चढाये गए पुष्पों को देख ऐसा लगता है जैसे वीर-शहीदों के साथ-साथ इन पुष्पों ने भी देश के लिए या किसी अच्छे कार्य के लिए अपने प्राणों कि आहुति दी है। इसी लिए हम वहां भी शहीदों के साथ-साथ अर्पित पुच्पों के आगे नत-मस्तक हो जाते हैं। क्या इतना सम्मान किसी और को मिलता है ? तो उत्तर होगा , शायद नहीं। सदियों से पुष्प की इस दी जाने वाली इस बलि को कभी किसी ने जानने की चेष्ठा की है ? पुष्पों कि इस गुपचुप कुर्बानी की भरपाई मनुष्यों द्वारा दिए जाने वाले अनजाने सम्मान से नही हो सकती। इसके लिए हमें यह प्रण करना होगा कि हम किसी भी विलासता या सजावट के लिए पुष्पों की बलि नहीं देंगे। तभी आने वाली पीढी को यह संस्कार मिलेगा कि फूलों को पालने में जितना मजा है उतना उन्हें तोड़ने में नहीं। फूलों से सही मायने में देव-स्थान और शहीद-स्मारक ही सुशोबित होते है, विलासता या सजावट नहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो महान कवित्री महा देवी वर्मा एक पुष्प कि व्यथा लिखने में अपना समय व्यर्थ नही गवाती।






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