Sunday, August 2, 2009

बचपन - न जाने तुम कहाँ चले गए

आज मैंने अपना एक नया ब्लॉग शुरू किया है। युवा-अवस्था व प्रोढा-अवस्था में पहुच कर, किसी न किसी कारण से हमें अपने अपने बचपन की याद किसी न किसी मोड़ पर अवश्य ही आती होगी . या फिर अठखेलियाँ करते नन्हे-नन्हे बच्चों को देख हम उनमें ही अपना बचपन तलाशने लगते हैं. इसी विषय पर आधारित मैंने इस ब्लॉग-पत्रिका का शुभारम्भ किया है व सभी लेखक जनों से उनके लेख इस ब्लॉग पर देखना चाहूँगा. इस ब्लॉग में बच्चों के लिए रोचक व ज्ञानवर्धक लेख व कवितायों भी आमंत्रित की जाती हैं।

सत्य कथा
इधर लक्ष्मण की धोती...........और उधर दर्शकों के ठहाके ।

बहुत पुरानी बात है जब हम कानपुर के स्वरुप नगर (मोतीझील के सामने ) रहा करते थे व मैं बिरला मन्दिर के करीब "टैगोर विद्या मन्दिर " में दूसरी या तीसरी कक्षा में पढता था । विद्यालय के वार्षिक व पारितोषिक वितरण समारोह के उत्सव का दिन था । सीता हरण के नाटक का प्रदर्शन हो रहा था । इस नाटक में रत्ना नाम की पांचवीं कक्षा की एक छात्रा ( जिसका कि बाद में विद्यालय कि एक पिकनिक से वापसी के समय "पनकी " के पास रेलवे के फाटक पर ट्रैक्टर पलटने से मृत्यु हो गई थी ) भगवान श्रीराम का रोल कर रही थी व मैं (विनायक शर्मा) लक्ष्मण का रूप धारण किए हुए राम के साथ -साथ चल रहा था । तो दृश्य था - सीता हरण के बाद राम का विलाप । विलाप करते हुए राम कहते हैं " हे खग मृग, हे मधुकर श्रेणी ,तुम देखि सीता मृग-नैनी" दृश्य बहुत ही करुणा मय था, राम जी का "हे सीते-हे सीते" कह कर विलाप करना व लक्ष्मण का सीता हरण के लिए स्यवम को दोषी मानते हुए "सीता-माता" पुकारते हुए क्रंदन करना । दो नन्हें-नन्हें कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट कला से सभी दर्शकों को न केवल मत्रमुग्ध ही कर रखा था अपितु सभी दर्शकों के नयन भी सजल थे । जंगल -जंगल विचरण करते हुए एक स्थान पर राम और लक्ष्मण अपना एक घुटना धरती पर टिका कर विलाप करते हैं फिर पुनः उठ कर चल देते हैं । इस दृश्य में उठते हुए मेरी यानि लक्ष्मणजी की धोती पावं में फँस कर खुल जाती है । वर्तमान समय की भांति हमारे बचपन में छोटे बच्चे जांगिया आदि नहीं पहना करते थे । ( विशेष: शायद इस घटना या दुर्घटना के पश्चात ही छोटे बच्चों को जांगिया या अंगवस्त्र पहनाने का प्रचलन आरम्भ हुआ हो )

अब आप सभी पाठक गण भली-भांति समझ सकते हैं कि उस समय वहां क्या दृश्य चल रहा होगा ? इसी बीच लक्ष्मण का सीता मैया को भूलकर, धोती पकढ़ कर "परदा गिराओ-परदा गिराओ" कि चिल्लाहट सुन कर भगवान राम भी सीते की पुकार छोड़ , परदा खींचने को दौर पड़े । हम तो उस समय बहुत ही छोटे थे । एक ओर से धोती खुलने से आई विपदा फिर उपर से "शेम -शेम" का भी भय, इसलिए दर्शकों कि प्रतिक्रिया तो अपनी आँखों से न तो हम देख पाए और न ही समझ पाए । बालसुलभ बुद्धी को इतना तो अवश्य ही समझ में आ गया था कि समाज में बहुत ही असमानता व्याप्त है । जब राम जी की सीता गई तो सभी के नयनों में नीर था परन्तु जब लक्षमण जी की धोती गई तो सभी ठहाके लगाने लगे । इस वृतांत को घटित हुए बहुत वर्ष बीत गए परन्तु देर तक आती रही उन ठहाकों की आवाज आज भी कानों में गूंजती सी प्रतीत होती है । हँसते -हँसते तो बहुत से लोगों की आँखों से पानी निकल आता है , परन्तु तनिक सोचिये जब हजार-पन्द्रह सौ दर्शकों की ऑंखें सजल हों और अचानक ही वे ठहाके लगाने लग जायें, तो करुणा से सराबोर ऐसा हास्य दृश्य देख कर आप भी कह उठेंगे "वाह क्या सीन है । "

आज इतने वर्षों बाद भी जब कभी मैं किसी विद्यालय के वार्षिक उत्सव में जाता हूँ , तो नजरें अपने सरीखे उस भोले से निरापद लक्ष्मण को अवश्य ही तलाशती हैं जो कि मेरे बचपन के साथ ही कहीं खो गया है ।

- विनायक शर्मा


कविता
पर .......मेरे बचपन न जाने तुम कहाँ खो  गए  .  

पहले गोद,कन्धा,उंगली फिर घुटनों के बल खिसकते -खिसकते
जाने कब नन्हे पांव   थिरकने के काबिल हो गए ,
लगता  कल की ही बात है , भूली नहीं अभी वोह थिरकन
पर ... मेरे बचपन न जाने तुम कहाँ खो गए .  

लडाई-झगडे, मार-पिटाई  पल में दोस्ती छिन्न  में अनबन

करते थे सब मिल कर रोज नई शैतानी
गिल्ली -डंडा  चोर-सिपाई पल की दोस्ती छिन्न में अनबन
पर ...मेरे बचपन न जाने तुम कहाँ खो गए .

बिस्कुट टॉफी चाकलेट "दो -आने" में बहुत मिलता था
बेर इमली एक पैसे का कैथा, मुझे अच्छा लगता था ,
दीवार फांद  आम अमरुद चुराना , सड़क किनारे तोड़ते थे जामुन
पर न जाने तुम कहाँ खो गए ....मेरे बचपन

बिरला-मन्दिर की नहर , "मोती-झील" सभी बहुत भाते थे
गंगाजी की धाराओं सिसोदिया घाट पर खेलना-कूदना,
नदी-नाले घाट और सड़कें अब भी भर जाते हैं आता है जब सावन
पर न जाने तुम कहाँ खो गए ....मेरे बचपन



अभी और ...



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